Galaxy Filaments: ब्रह्माण्ड के विशालतम घूमते पिंड हैं ये अनोखे रेशे

ब्रह्माण्ड का अध्ययन करते समय हमारे वैज्ञानिक बहुत से सवालों के जवाब खोज रहे हैं. इनमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के अलावा एक सवाल का जवाब जो लंबे समय से हमारे वैज्ञानिक तलाश रहे हैं, वह है- ग्रह और गैलेक्सी घूर्णन (Roatiation) क्यों करते हैं. घूर्णन को लेकर न्यूटन और अन्य वैज्ञानिकों ने भी व्याख्याएं की हैं. लेकिन वे काफी नहीं हैं. अब नए अध्ययन ने सुझाया है कि यह घूर्णन केवल गैलेक्सी (Galaxies) तक ही सीमित नहीं है. संभवतः पूरा ब्रह्माण्ड भी चलायमान अवस्था में हैं. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ब्रह्माण्ड के अब तक सबसे विशालकाय घूमते पिंड के तौर पर उन फिलामेंट या रेशों (Filament of Galaxies) को खोजा है जो विभिन्न गैलेक्सी समूहों को जोड़ते हैं.

क्या होते हैं ये फिलामेंट से रेशे

गैलेक्सी फिलामेंट को खगोलीय चर्चाओं में केवल फिलामेंट भी कहा जाता है. दो या अधिक गैलेक्सी समूहों को जोड़ने वाले तंतु की तरह काम करते हैं इसीलिए इन्हें यह नाम दिया गया है. लेकिन इन्हें सुपरक्लस्टर कॉमप्लेक्सेस, गैलेक्सी वाल्स और गैलेकसी शीट्स भी कहा जाता है. ये ब्रह्माण्ड के अब तक ज्ञात पिंडों में सबसे विशालकाय पिंड होते हैं.

इस शोध में पता चला

रेशे के आकार के ये पिंड 16 से 26 करोड़ प्रकाशवर्ष की मात्रा की लंबाई लिए होते हैं और उनके ये बहुत विशाल खाली स्थानों की सीमा का निर्माण करते हैं. ये खाली स्थन वॉइड या रिक्तियां कहती हैं. नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन दर्शाया है कि कैसे ये पिंड ब्रह्माण्ड के लंबे घूर्णन करने वाले पिंड बन गए.

कैसे बने थे ये रेशे

इससे पहले के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सुझाया था कि 13.8 अरब साल पहले बिग बैंग के बाद जब ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई थी, ज्ञात पदार्थ की अधिकांश गैस टूट कर विशालकाय चादरों में बदल गई जो टूट कर विशाल खगोलीय जाल के फिलामेंट बन गईं. उस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस बात की संभावना की पड़ताल भी की थी कि गैलेक्सी के रेशे जो लाखों करोड़ों प्रकाशवर्ष लंबे पदार्थ के विशाल बेलनाकार छल्ले (Tendril) होते हैं, खुद भी घूर्णन करते हैं.

हजारों रेशों का अध्ययन

इस अध्ययन के ले वैज्ञानकों के समूह ने हजारों रेशों का एक साथ अध्ययन किया और उनके अक्ष के लंबवत गैलेक्सी के वेग का अवलोकन किया. वैज्ञानिकों ने स्लोआन डिजिटल स्काई सर्वे के आंकड़ों का उपयोग कर 17 हजार से ज्यादा रेशों को अध्ययन किया. वैज्ञानिकों ने उन सभी गैलेक्सी की गति को मापा जो ये हर छल्ले में एक विशाल ट्यूब का निर्माण कर रही थीं

कोणीय आवेग का बनना

अपने विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये छ्ल्ले घूर्णन से तालमेल रखते हुए घुमाने की गतिविधि भी दर्शाते हैं जिससे ये ब्रह्माण्ड के ऐसे विशालतम पिंड हो जाते हैं जिनके पास कोणीय आवेग (Angular Momentum) होता है. रेशे के दो अंतिम बिंदुयों के सबसे निकट के दो तेजोमंडल (Halos) के भार का भी वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया जिससे उनका संकेतों के शक्ति से संबंध पता लगाया जा सके.

हर रेशा नहीं करता घूर्णन

इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि रेशों से निकलने वाले और अंत के स्थान के तेजोमंडल या हालो जितने ज्यादा भारी होते हैं, उतना ही ज्यादा घूर्णन होता है. ये नतीजे बताते हैं कि कोणीय आवेग अप्रयाशित रूप से बहुत ही विशाल पैमाने पर पैदा हो सकता है. वैज्ञानियों ने यह भी पाया कि ब्रह्माण्ड में हर रेशा घूर्णन नहीं करता है, लकिन घूर्णन करने वाले रेशे जरूर मौजूद हैं. यह शोध अब आगे के अध्ययनों को प्रेरित करने वाली साबित होगी जो यह बता सकें ऐसा क्यों होता है और इसमें बिगबैंग की क्या भूमिका है.

source:news18

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